हज़रत अबू-सईद ख़ुदरी (र) बयान करते हैं कि नबी (ﷺ) ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा के लिये ईदगाह तशरीफ़ ले जाते (मुत्तफ़क़ अलैह)
Mishkat 1426
हज़रत अबू-हुरैरा (र) से रिवायत है कि ईद के दिन बारिश हो गई तो नबी (ﷺ) ने उन्हें नमाज़े-ईद मस्जिद में पढ़ाई।
Mishkat 1448*
रसूलुल्लाह ﷺ ने ईद की नमाज़ ईदगाह (मुसल्ला-ए-ईद) में ही क्यों अदा की? इसका क्या मक़सद है? यह अज़ीम सुन्नत क्यों भुला दी गई है?
ईद की नमाज़ इस्लाम के बड़े शायर (धार्मिक प्रतीकों) में से है। जिस तरह हफ्ते में एक बार जुमे के दिन मुसलमान बड़ी तादाद में जमा होते हैं, उसी तरह रसूलुल्लाह ﷺ के ज़माने में मदीना के आसपास के गांवों और क़बीलों के लोग जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिद-ए-नबवी में ही आया करते थे। दिन में पाँच बार दूर-दराज़ से आना हर किसी के लिए आसान नहीं था, इसलिए पहले के दौर में छोटे गांवों की मस्जिदों में जुमे की नमाज़ नहीं होती थी। लोग पास के बड़े गांव या शहर में जाकर जुमे की नमाज़ अदा करते थे, और इसी वजह से कई मस्जिदों का नाम “जामा मस्जिद” पड़ा।
इसी तरह साल में दो बार, ईदैन (ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा) के मौके पर रसूलुल्लाह ﷺ सभी मुसलमानों को खुले मैदान (ईदगाह) में ले जाते थे, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग एक जगह इकट्ठा हो सकें। जुमे से भी ज़्यादा लोग चारों तरफ से आते और रसूलुल्लाह ﷺ के साथ ईद की नमाज़ अदा करते।
इस्लाम का दीन सबको साथ लेकर चलने का पैग़ाम देता है। यह इज्तिमाइयत (एकता) का सबक सिखाता है। एक उम्मत, एक क़ौम बनने का। बिखरने का नहीं। अफ़सोस की बात है कि आज मुसलमान छोटे-छोटे गिरोहों में बंट गए हैं। जहाँ पहले सिर्फ इबादतगाह हुआ करती थी, आज हर मोहल्ले और सोसायटी में जुमे की नमाज़ भी हो जाती है, और यही नहीं छोटी-छोटी मस्जिदों में ईद की नमाज़ भी अदा की जाने लगी है। ईदगाह या बड़ी जामा मस्जिदों में ईद की नमाज़ अदा करने का तसव्वुर लगभग खत्म हो गया है।
इसके दो बड़े कारण हैं: पहला —> समय की कमी; लोग चाहते हैं कि जल्दी से नमाज़ पढ़कर फ़ारिग हो जाएँ। दूसरा —> ईद के खुत्बों में वह असर नहीं रहा जो उम्मत को जोड़ सके।
रसूलुल्लाह ﷺ जुमे और ईद के खुत्बों में मौजूदा हालात पर बयान करते, नसीहत देते, और मुसलमानों की तरक़्क़ी व इस्लाम की बुलंदी के लिए मार्गदर्शन करते। क़ुरआन और सुन्नत की तालीम दी जाती थीं। लेकिन आज कई जगह खुत्बे सिर्फ चंदा इकट्ठा करने या किस्से-कहानियों तक सीमित हो गए हैं।
हमें क्या करना चाहिए? मस्जिद कमेटी को चाहिए कि ईद की नमाज़ का सही और मुनासिब वक्त तय करे। इमाम और ख़तीब को चाहिए कि मौजूदा हालात पर असरदार खुत्बे दें और उम्मत को सही राह दिखाएँ। आम लोगों को चाहिए कि छोटी मस्जिदों को बुजुर्गों, बच्चों और मजबूर लोगों के लिए छोड़ दें, और खुद ईदगाह या बड़ी जामा मस्जिदों में जाकर नमाज़ अदा करें। आइए, हम सब मिलकर रसूलुल्लाह ﷺ की इस भूली हुई सुन्नत को फिर से ज़िंदा करें।